हमारा प्रस्ताव है कि पैगम्बर मूसा और भगवान कृष्ण एक ही व्यक्ति थे. यदि ऐसा है तो इन्होने जो शिक्षा दी वह भी समान होनी चाहिए. मूसा द्वारा दी गई शिक्षा का सबसे अच्छा सारांश दस आदेशों में है जो उन्हें भगवान ने सिनाई पर्वत पर दिए थे. हम उन दस आदेशों की तुलना भागवत पुराण में बताए गए कृष्ण के प्रवचन के साथ करेंगे.
पैगम्बर मूसा के दस आदेश और भगवत गीता एक ही संदेश देते हैं
पहले आदेश में कहा गया कि “मैं ही वह भगवान हूँ जो तुम्हे इजिप्ट की दासता से निकालकर बाहर लाया.” इस बात को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि “मैं ही वह भगवान हूँ जिससे जुड़ने से तुम इजिप्ट की दासता से बहार आए.” इस परिवर्तन में बहुत महत्व है. मूसा के अनुसार भगवान एक बाहरी शक्ति है जो मनुष्य के अतिरिक्त है और जो मनुष्य को संचालित करती है और आदेश देती है. इसकी तुलना में कृष्ण कहते कि भगवान सर्वव्यापी है, भगवान मुझमे भी है और मैं भगवान से जुड़कर भगवान कि शक्ति को अर्जित करता हूँ. तब मैं भगवान के रूप में कार्य करने लगता हूँ. इस प्रकार भगवान की दो अलग-अलग विचारधरा है. मूसा के अनुसार भगवान एक बाहरी शक्ति है जबकि कृष्ण के अनुसार भगवान एक आंतरिक शक्ति हैं. इस विषय पर हम इस पोस्ट के अंत में हिब्रू शब्दों के उपर विशेष विचार करेंगे और दिखायेंगे कि हिब्रू शब्दों का दोनों तरह से अर्थ निकाला जा सकता है. अभी हम शेष आदेशों पर विचार करेंगे.

कृष्ण कहते हैं कि मिट्टी अथवा पत्थर की मूर्तियाँ ही ईश्वर नहीं होती हैं.
दूसरा आदेश है कि “किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा मत करो और मूर्ति के आगे मत झुको.” वर्तमान में हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का भारी प्रचलन है. लेकिन यह वर्तमान की स्थिति है. कृष्ण के समय ऐसा था यह विचारणीय हैं. भागवत पुराण के अनुसार किसी समय कृष्ण कुछ ऋषि मुनियों के साथ चर्चा कर रहे थे. उस समय उन्होंने कहा कि “केवल मिट्टी अथवा पत्थर की मूर्तियाँ ही ईश्वर नहीं होती हैं. जो लोग मिट्टी, पत्थर एवं लकड़ी की मूर्तियों को मानते हैं. वे मनुष्य शरीर में होकर भी पशु हैं.” अर्थ यह हुआ कि कृष्ण की सोच में मूर्ति पूजा श्रेष्ठ नही है. वे मूर्ति पूजा को एक पशुवत क्रिया मानते थे. उनका यह विचार मूसा को दिए गए दुसरे आदेश ‘मूर्ति की पूजा मत करो’ से मेल खाता है.

भागवत पुराण में कहा गया है कि वेद अंतिम सत्य को नहीं बताते हैं.
तीसरा आदेश है की “भगवान के नाम का उपयोग गलत ढंग से मत करो.” गलत ढंग को हम भोगवादी अथवा विषयवादी रूप में समझ सकते हैं. भगवान का नाम अपने आध्यात्मिक उन्नति के लिए लेना चाहिए न कि भौतिक वस्तुओं के संग्रह के लिए, ऐसा मूसा कहते हैं. कृष्ण भी यही कहते हैं. हमें ध्यान हो की वेद मूलतः भौतिकवादी ग्रंथ हैं. ऋग्वेद में अग्निदेव से बार-बार याचना की गई है कि हमें समृद्धि दो. इसी क्रम में भागवत पुराण में कृष्ण कहते हैं कि वेदों में जो स्वर्ग का वर्णन किया गया है, वह अंतिम सत्य नहीं है. वह उन लोगों की चित्त शुद्धि के लिए है जो इस संसार के प्रपंच में पड़े हुए हैं. इस प्रकार कृष्ण कहते हैं कि भौतिकवादी वेदों का बहुत ही सीमित औचित्य है. यदि आपके मन में बहुत वासनाएँ हैं, भोग इच्छा है, तो उनकी पूर्ति के लिए कुछ हद तक वेद आपको मदद कर सकते हैं. लेकिन अध्यात्म और मोक्ष वेद से नहीं मिलता ऐसा कृष्ण कहते हैं. यही बात मूसा कहते हैं कि भगवान का नाम भोगवादी अथवा गलत रूप से मत लो.
चौथा आदेश है कि “सप्ताह में सैबथ के दिन विशेष रूप से भगवान का ध्यान करो.” हिंदू धर्म में साप्ताहिक अवकाश का उल्लेख मुझे नहीं मिला है. लेकिन रुचिकर बात यह है की चौथे आदेश में जो सैबथ कहा गया वह मूसा के समय महत्वपूर्ण नहीं था. बाइबल में सैबथ की विशेषता एकम या प्रथमा तिथि के साथ बताई गई है. विद्वानों का मानना है कि एकम के दिन धार्मिक कृत्य किए जाते थे और सैबथ के दिन किसानो द्वारा अपने श्रमिकों और पशुओं को अवकाश दिया जाता था.

मूसा और कृष्ण के समय एकम तिथि का ही महत्व था.
इसी क्रम में भागवत पुराण में एकम के साथ पूर्णिमा का वर्णन मिलता है. जैसा की आप इस श्लोक में देख सकते हैं.
वानप्रस्थीके लिए अग्निहोत्र, दर्श (एकम), पौर्णमास (पूर्णिमा) और चातुर्मास्य, आदिका वैसा ही विधान किया है, जैसा गृहस्थोंके लिए है ॥
भागवत पुराण 11.18.8
अतः बाइबल और भागवत पुराण में एकम तिथि की समानांतरता है. बाइबल में एकम के साथ सैबथ बताया गया है. समयांतर में सैबथ प्रमुख हो गया और एकम पीछे हो गई. भागवत पुराण में एकम के साथ पूर्णिमा बताई गई है. समयक्रम में पूर्णिमा प्रमुख हो गई और एकम पीछे हो गई. इस प्रकार मूसा और कृष्ण के समय एकम तिथि का महत्व समानान्तर है. समयक्रम में बाइबल को मानने वालों ने सैबथ को ज्यादा महत्व दिया जबकि हिन्दू धर्म को मानने वालों ने पूर्णिमा को ज्यादा महत्व दिया. एकम तिथि का महत्व दोनों में बराबर है.
यहाँ एक अंतर यह दीखता है कि वर्तमान में सैबथ के दिन भोज किया जाता है एवं विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं जबकि हिन्दू धर्म में धार्मिक कृत्यों के दिन उपवास रखा जाता है. लेकिन यह भेद वर्तमान स्थिति का है. विद्वानों का मानना है कि पुराने समय में सैबथ के दिन उपवास रखा जाता था परचा यहाँ देखें– https://www.jstor.org/stable/pdf/3152768.pdf
समयक्रम में परिवर्तन हो गया है और उपवास के स्थान पर भोज किया जाने लगा है. इसलिए मूसा या कृष्ण के समय एकम तिथि के दिन उपवास का विधान समानान्तर दीखता है.
पांचवा आदेश है “अपने माता-पिता का आदर करो.” यह सामान्य सी बात है और भागवत पुराण में मुझे ऐसा कोई विशेष संदर्भ नहीं मिलता है.

मूसा का छठा आदेश: “किसी की हत्या मत करो” के समानांतर बलराम ने हत्या का प्रायश्चित किया.
छठा आदेश है कि “किसी की हत्या मत करो.” भागवत पुराण में इसी के समानांतर एक रूचिकर विवरण आता है. किसी समय कुछ ऋषियों द्वारा यज्ञ अनुष्ठान किया जा रहा था. उनके बीच कोई ऋषि प्रधान ऋषि के आसन पर जाकर बैठ गए. कृष्ण के बड़े भाई बलराम उस ऋषि को प्रधान ऋषि की उपाधि के उपयुक्त नहीं समझते थे. उन्होंने उन ऋषि की उसी समय हत्या कर दी. इसके बाद जितने ऋषि एकत्रित थे उन्होंने बलराम को कहा कि यह अपने गलत किया है. इन ऋषि ने कोई पाप नहीं किया था और अकारण अपने इनकी हत्या की है. तब बलराम ने प्रायश्चित किया. बलराम द्वारा प्रायश्चित करने से स्पष्ट होता है कि भागवत पुराण के अनुसार भी किसी व्यक्ति की अकारण हत्या नहीं करनी चाहिए जैसा की छठे आदेश में कहा गया है.
सातवां आदेश है कि “व्यभिचार नहीं करना चाहिए.” भगवान कृष्ण कहते हैं कि “व्यभिचार से व्यक्ति को भय और परेशानी उत्पन्न होती है” (भागवत पुराण 10:29:26). यह भी समानांतर है.
आठवां आदेश है “चोरी नहीं करनी चाहिए” और नौवां आदेश है “झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए.” यह सामान्य प्रकृति के आदेश हैं और भागवत पुराण में मुझे कोई स्पष्ट उद्धरण इनके समानान्तर नहीं मिलता है.

मूसा के आदेश “दूसरों की संपत्ति लेने की इच्छा मत करो” के समानांतर कृष्ण कहते है भौतिक वस्तुओं के प्रपंच में मत पड़ो.
दसवां आदेश है “दूसरों की संपत्ति लेने की इच्छा मत करो.” भगवान कृष्ण इसी के समानान्तर कहते हैं कि “मेरे तक पहुचने के तीन मार्ग है– भक्ति, कर्म और ज्ञान. जो इन तीनों के अतिरिक्त केवल इन्द्रियों से यानी भोग से, भौतिक वस्तुओं से चलित होता है, वह इस संसार के चक्कर काटते रहता है” (भागवत पुराण 11:21:1, 3). इनमे समानान्तर यह है कि मूसा कहते हैं कि दूसरों का संपत्ति मत लो यानी भौतिक वस्तुओं से अपने को दूर रखो और कृष्ण कहते हैं कि यदि भौतिक वस्तुओं के प्रपंच में आओगे तो चक्कर काटोगे. अतः भौतिक वस्तुओं से लगाव की निंदा मूसा और कृष्ण दोनों ही करते हैं. इस प्रकार हम देखते हैं कि मूसा को भगवान द्वारा दिए गए दस आदेश और भगवान कृष्ण द्वारा भागवत पुराण में दिए गए आदेश समानान्तर हैं.
अब पहले आदेश में भगवान के रूप की जो चर्चा की गई थी उसका मैं आपके सामने हिब्रू भाषा के संबंध में कुछ बातें रखना चाहूँगा. एक्सोडस 6.7 में नौ शब्द हैं जोकि इस चित्र में आप देख सकते हैं.

भगवान ने हिब्रूओं को ईजिप्ट से बाहर निकाला या हिब्रूओं ने भगवान मदद से खुद को बाहर निकाला?
ये शब्द हैं आई, लार्ड, गोड, वहू, आउट, लैंड, ईजिप्ट, हाउस, और सर्वेंट. बताते चले कि पुरानी हिब्रू भाषा, जिसमे कि बाइबल मौलिक रूप से लिखा गया था, उसमे स्वर नहीं हैं. उसमे केवल व्यंजन हैं. इसलिए हम जिस स्वर को इसमें जोड़ते हैं उससे इन शब्दों का अर्थ बदल जाता है.
इन नौ शब्दों को हिब्रू परंपरा में इस प्रकार समझा जाता है: मैं ही वह लार्ड गोड हूँ जो तुम्हे लैंड ऑफ़ ईजिप्ट के घर की दासता से बाहार लाया.
अब इन्ही नौ हिब्रू शब्दों को हम दूसरी तरह से भी समझ सकते हैं: मैं ही वह लार्ड गोड हूँ जिससे जुड़ने से तुम लैंड ऑफ़ ईजिप्ट के घर की दासता से बाहार आये.
इस प्रकार हम देखते हैं उन्ही नौ हिब्रू शब्दों के बीच अलग-अलग शब्दों को प्रवेश कराकर हम अलग अर्थ निकाल सकते हैं. मूसा के समय इन नौ हिब्रू शब्दों का क्या अर्थ रहा होगा यह हमे मालूम नहीं है. इन शब्दों का दोनों प्रकार से अर्थ निकाला जा सकता है. एक अर्थ यह निकलता है कि भगवान बाहार हैं और वह मेरी सहायता करके यह कार्य करा रहे हैं. दूसरा अर्थ यह निकलता है कि भगवान सर्वव्यापी है और उससे जुड़कर मैं स्वयं ईजिप्ट से बाहार आया. मुख्य बात यह कि उन्ही नौ शब्दों के दोनों विवरणों में कोई अंतरविरोध नहीं है. अतः मेरा विचार है कि हम इस पर गंभीरता से विचार करें की वर्तमान में बाइबल और हिन्दू धर्म के बीच जो अंतरविरोध दीखता है, वह बाद का तो नहीं है?

