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यहूदी, ईसाई, मुस्लिम एवं हिन्दू के साझा पूर्वज

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Historicity of the Garden of Eden

मेरे अध्ययन के अनुसार बाइबिल और कुरानिक धर्मों की उत्पत्ति सिंधु घाटी में हुई थी और मूसा ने मिस्र से नहीं, बल्कि सिंधु घाटी से पलायन (Exodus) का नेतृत्व किया था 1446 ईसा पूर्व के आसपास, जो पारंपरिक रूप से पलायन का समय माना जाता है। मिस्र में यहूदियों का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। इसके विपरीत सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास ध्वस्त हो गई थी जिसके कारण वहां के लोग सभी दिशाओं में फैल गए। इन लोगों में से कुछ पश्चिम एशिया गए और वही यहूदी बन गए। मूसा ने आदम, नूह और अब्राहम की यादें सिंधु घाटी से लीं और ये सभी व्यक्ति मूल रूप से सिंधु घाटी में रहते थे। इन यादों को बाइबिल में समाहित कर लिया गया। महाभारत के मौसल पर्व में उल्लेख है कि यादवों के आपसी संघर्ष के बाद कृष्ण एक अज्ञात देश के लिए रवाना हो गए। यह अज्ञात देश इसराइल था जिससे यह संकेत मिलता है कि कृष्ण ही मूसा थे।

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क्या कुरान मूर्तिपूजा को नकारती है?

Posted on December 27, 2024December 27, 2024 By ekishwar

सीधे पढने पर ऐसा प्रतीत होता है की कुरान मूर्तिपूजा को नकारती है और मूर्तिपूजकों को नकारात्मक दृष्टी से देखती है लेकिन ध्यान से पढने पर ऐसा समझ आता है की मूर्तिपूजा दो प्रकार की होती है, एक वह जब मूर्ति को हम अल्लाह या ब्रह्म के अंश के रूप में देखते हैं और दूसरा वह जब ..हम मूर्ति को अल्लाह या ब्रह्म के बराबर देखते  है. हमारी समझ से कुरान मूर्ति को अल्लाह के अंश रूप में देखने को स्वीकार करती है जबकि मूर्ति को अल्लाह के बराबर रखने को नकारती है. इस परिपेक्ष में हम इस पोस्ट में कुरान की विभिन्न आया की विवेचना करेंगे और यह दिखाने की कोशिश करेंगे की जब मूर्ति अल्लाह के अंश के रूप में देखी जाये तो उसको कुरान नकारती नहीं है. 

  1. आया: फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है। (कुरान 9.5) (ये भी देखें- कुरान 9.28)

टिप्पणी: ये मुश्रिक वह लोग हैं जो की मूर्तिपूजा करते थे लेकिन अल्लाह की शक्ति को नहीं मानते थे. मूर्तिपूजा दो तरह की होती है एक जिसमे आप मूर्ति को अल्लाह के नीचे मानते हैं और दूसरी जिसमे आप मूर्ति को अल्लाह के बराबर मानते हैं या अल्लाह को नहीं मानते है. हिन्दू मूर्तिपूजा अल्लाह के नीचे वाली श्रेणी में है. वह मुश्रिक की श्रेणी में नहीं है. जो हिंदूमूर्ति पूजा के साथ-साथ ब्रह्म या अल्लाह की परम शक्ति को मानते हैं वे मुश्रिक नहीं हैं.

  1. आया: ऐ ईमान लानेवालो! उन इनकार करनेवालों से लड़ो जो तुम्हारे निकट हैं और चाहिए कि वे तुममें सख़्ती पाएँ, और जान रखो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है. (कुरान 9.123)

आया: ऐ ईमान लानेवालो! अपने बाप और अपने भाइयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र उन्हें प्रिय हो. तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे. (कुरान 9.23)

टिपण्णी: कुरान का मूल संदेश यह है कि अल्लाह या ब्रह्म अकेला है और अकेली शक्ति है. उसके बराबर कोई दूसरा नहीं है. इस आया में कहा गया कि हमारी आयतों से इनकार किया उसका अर्थ है कि जो उस एकल ब्रह्म या अल्लाह की शक्ति को नकारता है उसे अग्नि में झोंका जाएगा यह अग्नि नरक की अग्नि होगी जिसे मृत्यु के बाद व्यक्ति प्राप्त करेगा इसलिए यदि कोई हिन्दू ब्रह्म या अल्लाह की शक्ति को मानता है तो उस पर यह आया लागू नहीं होती है.

  1. आया: ऐ ईमान लानेवालो! तुमसे पहले जिनको किताब दी गई थी, जिन्होंने तुम्हारे धर्म को हँसी-खेल बना लिया है, उन्हें और इनकार करनेवालों को अपना मित्र न बनाओ. और अल्लाह का डर रखो यदि तुम ईमानवाले हो. (कुरान 5.57)

टिप्पणी: इस आया में कहा गया कि जो लोग ब्रह्म या अल्लाह में विश्वास करने वालों की हंसी उड़ाते हैं और अल्लाह या ब्रह्म की शक्ति को नकारते हैं उन्हें मित्र नहीं बनाना चाहिए क्योंकि संगत का असर पड़ता है. यदि हम ऐसे लोगों के साथ रहेंगे तो हम भी अल्लाह या ब्रह्म की सत्ता को नकारने लगेंगे जिसके दुष्परिणाम होंगे.

  1. आया: यदि कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है और मदीना में खलबली पैदा करनेवाली अफ़वाहें फैलाने वाले बाज़ न आएँ तो हम तुम्हें उनके विरुद्ध उभार खड़ा करेंगे। फिर वे उसमें तुम्हारे साथ थोड़ा ही रहने पाएँगे.(कुरान 33.60) फिटकारे हुए होंगे. जहाँ कहीं पाए गए पकड़े जाएँगे और बुरी तरह जान से मारे जाएँगे. (कुरान 33.61)

आया: मुनाफिक यानी दोगले या धोखेबाज लोग, जहां भी मिलेंगे, उन्हें पकड़ा जाएगा और बहुत कठोरता से सजा दी जाएगी या मार दिया जाएगा. (कुरान 33.61)

टिप्पणी: रसूल मोहम्मद मदीना में रहते थे. वे इस बात का प्रचार करते थे कि अल्लाह की परम शक्ति की ही पूजा करनी चाहिए. लेकिन कुछ लोग उनके विरुद्ध अफवाहें फैलाते थे. उन लोगों के प्रति इस आया में कहा गया कि ऐसे अफवाह फैलाने वालों को जहां भी पकड़ा जाए वहां कत्ल किया जाए. इस प्रकार का दंड देना हिन्दू धर्म में नहीं माना जाता है. हिन्दू धर्म के अनुसार जो लोग अलग मत रखते हैं उनको अपने मत के अनुसार अल्लाह या ब्रह्म की प्राप्ति करने का अधिकार है. यहां विषय राजनीतिक है क्योंकि मदीना में रसूल मुहम्मद का राज्य था इसलिए जो लोग उनके राज्य के विरोध में कहते थे उन्हें राजद्रोही समझकर कत्ल करे जाने की बात कही गई है. इसे धर्म से न जोड़कर मदीना की राजनीति से जोड़कर इस आया को देखना चाहिये.

  1. आया: अल्लाह ने तुमसे बहुत-सी गनीमतों का वादा किया है, जिन्हें तुम प्राप्त करोगे. यह विजय तो उसने तुम्हें तात्कालिक रूप से निश्चित कर दी. और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिए (कि वे तुमपर आक्रमण करने का साहस न कर सकें) और ताकि ईमानवालों के लिए एक निशानी हो. और वह सीधे मार्ग की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे. (कुरान 48.20)

 आया: और उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जिसे उसके रब की आयतों के द्वारा याद दिलाया जाए,फिर वह उनसे मुँह फेर ले? निश्चय ही हम अपराधियों से बदला लेकर रहेंगे. (कुरान 32.22)

टिप्पणी: अल्लाह ने तुमसे यह वादा किया है कि तुम्हें बहुत सी संपत्तियाँ या लाभ मिलेंगा. यह एक धार्मिक या आध्यात्मिक संदर्भ में कहा गया वाक्य है, जहाँ ‘गनीमत’ का अर्थ उन वस्तुओं या संपत्तियों से है जो किसी संघर्ष या प्रयास के बाद प्राप्त होती हैं.

इस्लाम धर्म में अल्लाह शब्द का उपयोग ब्रह्म और ईश्वर दोनों के लिए किया गया है. इस आया में कहा गया कि ईश्वर ने तुम्हें यानी विश्वास करने वालों बहुत सारी संपत्तियां या लाभ देने का वायदा किया है जो निश्चित रूप से फलीभूत होगा. ईश्वर ने विश्वास करने वालों के विरोध में जो लोग खड़े हैं उनका साहस समाप्त कर दिया है कि वे विश्वासियों पर आक्रमण न करें.

यहां यह भी कहा गया कि ईश्वर सीधे मार्ग की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करें यानी हिन्दू धर्म में पूजा, अवतारों,  देवताओं की कि जाती है और उनके माध्यम से ब्रह्म तक पहुंचा जाता है लेकिन इस्लाम में कहा गया कि सीधे ब्रह्म की पूजा करना चाहिए. इसलिए कहा गया कि वह सीधे मार्ग की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करें. यह हिन्दू और इस्लाम धर्म में एक मौलिक अंतर है कि हिन्दू धर्म बीच में मध्यस्थता करने के लिए अवतारों और देवताओं की मदद स्वीकार करता है और उनके माध्यम से ब्रह्मलीन होने के उद्देश्य को हासिल करता है जबकि इस्लाम धर्म केवल सीधे ब्रह्म या अल्लाह की पूजा करने की वकालत करता है.

  1. आया: जो कुछ ग़नीमत का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो. निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है. (कुरान 8.69)

आया: जो भी चीज़ तुमने मेहनत से हासिल की है, उसे सही और पवित्र समझकर इस्तेमाल करो. ईमानदारी से अर्जित की गई चीज़ों को उपयोग में लाना सही है. (कुरान 8.69)

टिप्पणी: धर्म मे झूठ फरेब इत्यादि से अर्जित धन को निकृष्ट बताया गया है और यह कहा गया है कि व्यक्ति को धर्मानुकूल आचरण करना चाहिए. यही बात इन आया में कही गई है कि जो ईमानदारी से अर्जित की गई संपत्ति है उस मात्र का उपयोग करना चाहिये.

  1. आया: ऐ नबी! इनकार करनेवालों और कपटाचारियों से जिहाद करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ। उनका ठिकाना जहन्नम है और वह अन्ततः पहुँचने की बहुत बुरी जगह है. (कुरान 66.9)

आया: अतः हम अवश्य ही उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे, और हम अवश्य उन्हें उसका बदला देंगे जो निकृष्टतम कर्म वे करते रहे हैं. (कुरान 41.27)

टिप्पणी: हिन्दू धर्म में नरक की विस्तृत व्याख्या है जहां पापियों को तरह-तरह की यातनाएं दी जाती है. यही बात इस आया में कही है कि जिन्होंने इंकार किया या गलत तरह से धन को अर्जित किया उन्हें सजा दी जायेगी.

  1. आया: निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों से उनके प्राण और उनके माल इसके बदले में ख़रीद लिए हैं कि उनके लिए जन्नत है. वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं, तो वे मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं. यह उसके ज़िम्मे तौरात, इनजील और क़ुरआन में (किया गया) एक पक्का वादा है. और अल्लाह से बढ़कर अपने वादे को पूरा करनेवाला हो भी कौन सकता है? अतः अपने उस सौदे पर खु़शियाँ मनाओ, जो सौदा तुमने उससे किया है. और यही सबसे बड़ी सफलता है. (कुरान 9.111)

टिप्पणी: इस आयत में कहा गया है की अल्लाह ने सच्चे विश्वास वाले लोगों से उनके जीवन और संपत्ति को एक विशेष इनाम के बदले में खरीद लिया है. यह इनाम स्वर्ग है. इन विश्वास रखने वालों का कर्तव्य है कि वे अल्लाह के रास्ते में संघर्ष करें, जिसमें वे दूसरों से लड़ते हैं और अपनी जान भी कुर्बान कर देते हैं. यह आयत उन लोगों के बलिदान और ईमान की भावना को प्रकट करती है, जो अपने धर्म और अल्लाह के आदेशों के लिए अपना सब कुछ अर्पित करने को तैयार रहते हैं. हिंदू धर्म में भी कहा जाता है की ईश्वर अपने भक्त की परीक्षा लेता है और उसका सर्वस्व हर लेता है. वह देखता है की सुख संपत्ति के जाने के बाद उसका ईश्वर में विश्वास बना रहता है या नहीं. यही बात इस आया में कही गई है कि जो लोग अल्लाह के रास्ते चलते हैं वे अपने सुख संपत्ति को त्याग देते है.

  1. आया: ऐ नबी! मोमिनों को जिहाद पर उभारो. यदि तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इनकार करनेवालों में से एक हज़ार पर प्रभावी होंगे, क्योंकि वे नासमझ लोग हैं. (कुरान 8.65)

टिप्पणी: यहां कहा गया कि ईमानदार और ईश्वर पर भरोसा रखने वाले कम संख्या में लोग ज्यादा संख्या में शत्रुओं से लड़कर विजयी होते हैं यानी कि जो धार्मिक योद्धा है वह अधार्मिक योद्धा के ऊपर भारी पड़ता है.

  1. आया: वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते हैं और न सत्यधर्म का अनुपालन करते हैं, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगें. (कुरान 9.29)

आया: वे तो चाहते हैं कि जिस प्रकार वे स्वयं अधर्मी हैं, उसी प्रकार तुम भी अधर्मी बनकर उन जैसे हो जाओ; तो तुम उनमें से अपने मित्र न बनाओ, जब तक कि वे अल्लाह के मार्ग में घर-बार न छोड़ें. फिर यदि वे इससे पीठ फेरें तो उन्हें पकड़ो, और उन्हें क़त्ल करो जहाँ कहीं भी उन्हें पाओ – तो उनमें से किसी को न अपना मित्र बनाना और न सहायक. (कुरान 4.89)

आया: उनसे लड़ो. अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन्हें यातना देगा और उन्हें अपमानित करेगा और उनके मुक़ाबले में वह तुम्हारी सहायता करेगा. और ईमानवाले लोगों के दिलों का दुखमोचन करेगा. (कुरान 9.14)

टिप्पणी: इस आया में ज्यूस और क्रिश्चियन पर टिप्पणी की गई है. कहा गया है कि यद्यपि वे किताब वाले हैं पर इस दृष्टि से मुसलमानों को स्वीकार है परंतु यदि वे अल्लाह पर विश्वास नहीं रखते, अंतिम दिन और रसूल की बातों पर विश्वास नहीं करते, सत्य धर्म का पालन नहीं करते तो किताब वाले होने के बावजूद अतः ज्यूस क्रिश्चियन होने के बावजूद उनसे लड़ो. यहां मुख्य बात यह है कि किसी धर्म के अनुयायी बाहरी आवरण पर न जाकर उसकी विचारधारा के आधार पर उसका स्टेटस निर्धारित करना चाहिए.

इस कथन का महत्व यह है कि यदि किताब वाले अल्लाह पर विश्वास नहीं करते तो उनसे लड़ो. इसका अर्थ यह भी होता है कि जो किताब वाले नहीं हैं परंतु अल्लाह पर ईमान रखते हैं, अंतिम दिन पर विश्वास करते हैं और संतों को मानते हैं, सत्य धर्म का अनुपालन करते हैं तो उनके द्वारा किताब ना मानने को नजरअंदाज करना चाहिये क्योंकि मुख्य बात व्यक्ति के विश्वास की है.

Archaeologist, Indus Valley, Interfaith, Philosophy, Quran

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Phone no : +91-9917144777

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