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यहूदी, ईसाई, मुस्लिम एवं हिन्दू के साझा पूर्वज

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Historicity of the Garden of Eden

मेरे अध्ययन के अनुसार बाइबिल और कुरानिक धर्मों की उत्पत्ति सिंधु घाटी में हुई थी और मूसा ने मिस्र से नहीं, बल्कि सिंधु घाटी से पलायन (Exodus) का नेतृत्व किया था 1446 ईसा पूर्व के आसपास, जो पारंपरिक रूप से पलायन का समय माना जाता है। मिस्र में यहूदियों का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है। इसके विपरीत सिंधु घाटी सभ्यता लगभग 1500 ईसा पूर्व के आसपास ध्वस्त हो गई थी जिसके कारण वहां के लोग सभी दिशाओं में फैल गए। इन लोगों में से कुछ पश्चिम एशिया गए और वही यहूदी बन गए। मूसा ने आदम, नूह और अब्राहम की यादें सिंधु घाटी से लीं और ये सभी व्यक्ति मूल रूप से सिंधु घाटी में रहते थे। इन यादों को बाइबिल में समाहित कर लिया गया। महाभारत के मौसल पर्व में उल्लेख है कि यादवों के आपसी संघर्ष के बाद कृष्ण एक अज्ञात देश के लिए रवाना हो गए। यह अज्ञात देश इसराइल था जिससे यह संकेत मिलता है कि कृष्ण ही मूसा थे।

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, ज्योतिष्पीठ, वाराणसी

Posted on July 2, 2019August 28, 2024 By ekishwar

श्री भरत झुनझुनवाला जी की नई किताब “कॉमन प्रोफेट्स ” आज  देखने को मिली. कुछ अंश पढे भी. बधाई देना चाहता हूँ श्री भरत जी को कि उन्होंने बिखर रहे या यूँ कहें- एक दूसरे के विरुद्ध लामबंद हो रहे समाजों के बीच समानताएँ’ देखनी आरम्भ तो कीं. जबकि वर्तमान विश्व में भेद- दर्शन का प्रयास अधिक किया जा रहा है.

हमारा यह मानना है कि हम सब एक ही मूल से निकली शाखा- प्रशाखाएं हैं, जो देशकाल तथा परिस्थिति से विलग सी दिखने लगी हैं. यदि हमारे बाह्य-कलेवर को भिन्न देख हमारे अंतर को भी भिन्न मान लिया गया तो भेद का भाव गहरा हो जायेगा. जो पारस्परिक अनर्थ का कारण होगा. जिसका समर्थन कोई भी विज्ञ पुरुष नहीं क्र सकता.

श्री भरत जी उस भारतीय भावना के प्रतीक बन रहे हैं जो- ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम’ को अपना ध्येय वाक्य मानती रही है.

ईशावास्यमिदं सर्वम यत्कियंच जगत्यां जगत कि वेदध्वनि तुलसीदास जी तक भी ‘सियाराममय सबजग जानी’ के रूप में सुनाई देती रही है. पर दुर्भाग्य से आज वह तिरोहित हो रही है.

श्री भरत जी जैसे लोगों के स्वर से समृद्ध होकर वह भावना पुनः दिग्दिगंत में गूंजने लगेगी और संसार भर के लोग एक दूसरे का समादर करते हुए विश्व को सही दिशा देंगे. ऐसी मेरी भावना है.

श्री भरत जी का ग्रन्थ अपने उद्देश्य में सफल हो, ऐसी भावना है.

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